राकेश चन्द्र
भाइयों और बहनों,
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कृपया भेजे हुए अटैचमेंट को जरूर पढ़ें. मैंने इसे कचरे के डब्बे से निकालकर
scan किया हैं. यह मेरे लिए महत्वपूर्ण इसलिए हो गया इसके पीछे मेरे साथ घट
चुकी एक सच्ची घटना जुडी हुई है.
मेरे एक पुराने मित्र मुझे उनके* NGO की दूकान* में सम्मिलित करने के लिए पिछले
कुछ महीनों से पीछे पड़े हुए हैं. पहले तो मैंने मुस्कुराकर उनकी बातें सुनी,
कोई चेहरे पर भाव नहीं दिखाए. वो चले गए, शायद उनके मन में कुछ विजय के भाव उठे
होंगे. फिर जब तब उनका आना जाना बढ़ गया और उनकी संस्था (जिसे वो world class
vision और great creation कहते हैं वस्तुतः वेदों से उड़ाया गया एक वाक्य है)
के बारे में मेरे साथ जरूरत से ज्यादा चर्चा करने लगे तो मैंने साफ़ साफ़ सबकुछ
बता देना उचित समझा. मैंने उन्हें कहा कि आप जो कार्य कर रहे हैं उसका उद्देश्य
भले ही अच्छा है, पर आपकी राह मुझे सही और स्पष्ट नहीं लग रही है. मैं पहले ही
स्वामी रामदेव जी के भारत स्वाभिमान आन्दोलन से जुड़ा हूँ. मैं स्वदेशी और
आवुर्वेद के प्रचार प्रसार के अलावा सामाजिक बुराइयों के प्रति भी लोगों को
आगाह कर रहा हूँ. इसपर वो भड़क गए और मुझे कह डाला कि तुम तो ये दूकान खोल कर
बैठ गए हो और सोच रहे को कि समाज के लिए बहुत अच्छा काम कर रहे हो? कितने लोग
तुम्हारे जैसे लोगों के सुधारने से सुधर जायेंगे? तुम ये सोच रहे हो कि लोगों
को सुधार कर तुम समाज का भला कर पाओगे तो ये गलत है. तुम्हारा ये बिजनेस गड्ढे
में जाने वाला है. तुम्हारा यह छोटा सा vision लेकर सारी जिंदगी छोटे ही बने
रहोगे....एक दिन स्वामी रामदेव, श्री श्री रविशंकर और इन बाबाओं ढाबाओं को
मेरे मंच पर आकर झुकना पड़ेगा... इत्यादि. मैंने उन्हें बड़ी विनम्रता से कहा कि
मैं आपसे असहमत होकर भी सहमत हूँ और यही भारत कि विशेषता हैं.
कुछ दिनों तक वो आस पास दीखाई नहीं पड़े पर एक दिन फिर आ धमके. कहने लगे, ' आपने
बहुत बड़ी बात कह दी. असहमत होकर भी सहमत होना बहुत बड़ी बात है. मुझे तुम्हारी
बहुत आवश्यकता है. मैं ऐसा सबको नहीं कहता हूँ. तुमको इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि
तुम्हारे अन्दर मुझे एक आग दिख रही है. एक जज्बा है जो अच्छाई वाला
है'.....इत्यादि इत्यादि. फिर उन्होंने उनकी संस्था का logo दिखाया और विचार
पूछा. मैंने तारीफ कि क्योंकि संस्था के नाम के अनुसार वह अच्छा बना था. बातचीत
के सिलसिले में उनके मुंह से निकाल ही गया कि इस संस्था में अच्छे लोग होने से,
मंच पर अच्छे लोग होने से प्रभाव अच्छा होगा और अच्छे fund मिलेंगे आखिर ये भी
तो एक दूकान है जिसमें presentation अच्छा करना पड़ता है. जैसे ही उन्हें लगा
कि वो कुछ गलत सा कह गए, अपने उस वाक्य को संतुलित करने के लिए कई और उदाहरण और
वाक्य बना डाले. पर सच्चाई मुझे पता चल चुकी थी. कुछ देर और बात करने के बाद
मुझे उनकी संस्था में सम्मिलित होने के लिए कई और भी हथकंडे अपनाने की कोशिश के
बाद वो चले गए.
अगले दिन ही यह अखबार का दुकड़ा मेरे घर में शायद कोई मसाला वगैरह पैक होकर
आया. आप सब के लिए इसे भेज रहा हूँ. अपने विचार अवश्य लिखें.
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