इधर दिल्ली में सज्जन कुमार के बरी होने पर विरोध किया जा रहा है, मानो यह पहला व्यक्ति है जो बरी हुआ है | ७४ से ८४ के बीच जिन्होंने निर्दोष लोगों को बसों से उतार कर, बम आदि लगा कर मार डाला था, उनमे से भी कई बरी हुए होंगे, क्या उनके मुक़दमे भी दुबारा खोल कर उन्हें फाँसी दे देनी चाहिए ? क्या न्यायिक प्रक्रिया, प्रदर्शनों की गुलाम बना देनी चाहिए ?
यदि भिंडरावाले को महिमामंडित किया जा रहा है तो क्या ८४ के दंगाईयों को हार नहीं पहनाना चाहिए ? क्यों न, यमुना के किनारे, कोई उचित स्थान देख कर, इन का भी भव्य स्मारक बनाया जाये ?
मूर्खता के जिस मार्ग पर सिख समाज के अगुआ उसे ले जा रहे हैं वो कहाँ जा कर रुकता है यह सबने देखा है | हम तो यही कामना कर सकते हैं कि ईश्वर इन्हें फिर से गुरुओं के दिखाए मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे |Statistics: Posted by SDD — Thu May 02, 2013 12:00 pm
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